अच्छे स्वाभिमान का निर्माण (Build a positive self - esteem)| Success होने के मंत्र | Motivational Story
अच्छे स्वाभिमान का निर्माण (Build a positive self - esteem)| Success होने के मंत्र | Motivational Story
स्वाभिमान क्या है? What is self - esteem?
स्वाभिमान वह साधन है जिसके द्वारा हम स्वयं को महसूस करते हैं। जब हम अंदर से अच्छा महसूस करते हैं तो हम बेहतर करते हैं, और घर और दफ्तर के लोगों के साथ हमारे रिश्ते बेहतर बनते हैं। दुनिया खूबसूरत लगने लगती है।इसका क्या कारण है? यहां महसूस करने और व्यवहार करने के बीच एक सीधा संबंध है क्योंकि हम किसी चीज या चीज के बारे में महसूस करने के तरीके का व्यवहार करेंगे।
अच्छे स्वाभिमान का निर्माण कैसे करें? (How to build good self-respect?)
यदि आप जल्द से जल्द अच्छे आत्म-सम्मान का निर्माण करना चाहते हैं, तो ऐसा करने का सबसे तेज़ तरीका उन लोगों के लिए कुछ करना है, जो बदले में आपको पैसा या धन नहीं दे सकते।महान लेखक शिव खेरा जी का कहना हैं की कुछ साल पहले उन्होंने जेल में क्रैदियों को नज़रिया और स्वाभिमान सिखाने के लिए एक प्रोग्राम किया । कुछ ही हफ्तों में उन्होंने वहाँ उतना कुछ सीखा , जितना सालों में नहीं सीख सका था । उनका प्राग्राम दो हफ़्ते अटेंड ( attend ) करने के बाद एक कैदी ने उन्हें रोककर पूछा,
“शिव , मैं आपसे बात करना चाहता हूँ ।'' उसने बताया कि वह कुछ ही हफ्तों में जेल से छूटने वाला है। उन्होंने उससे पूछा कि उनके इस प्रोग्राम से उसे क्या फ़ायदा हुआ ?
कुछ देर तक सोचने के बाद उसने बताया कि अब वह अपने बारे में अच्छा महसूस करता है । उन्होंने कहा कि “अच्छा मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता । मुझे ठीक से बताओ कि तुम्हारे व्यवहार में क्या बदलाव आया है ?"
उनका मानना है कि एक इंसान तब तक कुछ नहीं सीखता जब तक उसके व्यवहार में बदलाव न आए । उसने बताया कि जब से उनका प्रोग्राम शुरू हुआ है तब से वह रोज़ाना बाइबिल पढ़ता था। तब उन्होंने पूछा कि बाइबिल पढ़ने का उस पर क्या असर पड़ा है ? उसने बताया कि अब वह अपने और दूसरों के बारे में अच्छा महसूस करता है , जैसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था ।
उन्होंने कहा, “यह सब तो ठीक है , लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि जेल से रिहा होने के बाद तुम क्या करोगे?" उसने बताया कि रिहा होने के बाद वह समाज का एक ज़िम्मेदार और उपयोगी सदस्य बनने की कोशिश करेगा।
उन्होंने उससे दूसरी बार वही सवाल पूछा और उन्हें जवाब भी पहले जैसा ही मिला । जब उन्होंने वही सवाल उससे तीसरी बार भी पूछा कि " तुम जेल से निकलने के बाद क्या करोगे?" यक़ीनन वें कुछ और ही जवाब खोज रहा थे।
इस बार उसने गुस्से से कहा कि “ मैं समाज का जिम्मेदार और उपयोगी सदस्य बनूँगा।" तब उन्होंने उसे उसके पहले और इस जवाब में आए फ़र्क को बताया।
पहले उसने कहा था कि "मैं बनने की कोशिश करूँगा।" और इस बार उसने कहा कि “मैं बनूंगा।" - फ़र्क ' कोशिश ' लफ़्ज़ का था। उसने ' कोशिश ' लफ्ज़ से छुटकारा पा लिया, यही अक्ल की बात थी।
किसी काम को या तो हम करते हैं या नहीं करते हैं। ' कोशिश ' लफ़्ज़ उसके दोबारा जेल आने के दरवाजे खुले ही रखता है। दूसरा कैदी जो उनकी बातें सुन रहा था उसने शिव खेड़ा से पूछा की तुम्हें इस काम के क्या पैसे मिलते हैं? " उन्होंने उससे कहा कि जो खुशी और अहसास मुझे अभी मिले हैं , वे पूरी दुनिया की दौलत से भी बढ़कर हैं।
तब उसने पूछा," आप यहाँ क्यों आते हैं?" उन्होंने कहा," मैं तो यहाँ अपने स्वार्थ के लिए ही आया हूँ। और मेरा स्वार्थ का कारण है - इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाना। "इस तरह का स्वार्थ अच्छा होता है।
थोड़े में कहें तो आप समाज ( system ) को जैसा देते हैं , वैसा ही उससे पाते हैं। कई बार तो जितना आप देते हैं, उससे कहीं ज़्यादा ही पाते हैं । लेकिन आप समाज को कुछ देते समय उसके बदले में कुछ पाने की इच्छा न रखें।
एक और कैदी ने कहा , " कोई जो भी करे, वह उसकी मर्जी। जब लोग नशा करते हैं , तो इससे आपको क्या मतलब? आप उन्हें अकेला क्यों नहीं छोड़ देते? " उन्होंने जवाब दिया , " मेरे दोस्त , हालाँकि मैं तुम्हारी बातों से सहमत नहीं हूँ । तब भी तुम जो कह रहे हो , उससे मैं समझौता करके मान लूँगा कि इन सबसे मुझे कोई मतलब नहीं है,
अगर तुम मुझे इस बात की गारंटी दो कि नशा करने वाला जब भी गाड़ी चलाएगा और दुर्घटना होगी तो वह सिर्फ पेड़ के साथ ही एक्सीडेंट करेगा, तब मैं समझौता कर लूँगा ;
लेकिन अगर तुम गारंटी नहीं दे सकते कि जब वे नशा करेंगे और दुर्घटना होगी तो तुम और तुम्हारे बचे या मैं और मेरे बच्चे पहिए के नीचे दबकर नहीं मरेंगे , तो बेहतर होगा कि तुम विश्वास करो कि यह मेरी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि मैं नशेबाज़ को सड़क से दूर रखू।
इस एक कहावत ने , " यह मेरी जिंदगी है , मैं जो चाहूँ वही करूंगा , हमें फ़ायदे की बजाए नुकसान ही ज़्यादा पहुँचाया है । लोग भाव को नज़रअंदाज़ करते हुए उसका वह मतलब निकालते हैं , जो उन्हें अच्छा लगे। ऐसे लोगों ने इसका मतलब स्वार्थ निकाला है और मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस कहावत का यह भाव नहीं होगा।
ऐसे लोग भूल जाते हैं कि हम समाज से अलग नहीं रहते। जो आप करते हैं उसका असर अगले इंसान पर पड़ता है और जो अगला इंसान करता है उसका असर आप पर पड़ता है । हम लोग एक - दूसरे से जुड़े हुए हैं ।
हमें अहसास करना चाहिए कि हम सब इस धरती के भागीदार हैं और हमें ज़िम्मेदारी के साथ व्यवहार करना सीखना चाहिए । दुनिया में दो तरह के लोग हैं : लेने वाले और देने वाले । लेने वाले खूब खाते हैं और देने वाले चैन की नींद सोते हैं।
देने वालों में ऊँचे स्वाभिमान का भाव होता है । उनका नजरिया अच्छा होता है , और वे समाज की सेवा करते हैं। समाज की सेवा करने वालों से मेरा मतलब उन टटपूंजिये नेताओं ( pseudo leader ) से नहीं है जो समाज सेवा की आड़ में अपना मतलब साधते हैं।
इंसान होने के नाते हमें पाने ( receive ) और लेने ( take ) की जरूरत होती है। फिर भी ऊँचे स्वाभिमान से भरे अच्छे शख्स को सिर्फ लेने की ही नहीं , बल्कि देने की भी जरूरत होती है।
एक आदमी अपनी नई कार की सफ़ाई कर रहा था।
जब उसके पड़ोसी ने पूछा कि, " यह कार तुम -कब लाए ?"
उसने जवाब दिया, “ यह कार मेरे भाई ने मुझे दी है ।
इस पर पड़ोसी ने कहा, "काश, मेरे पास भी ऐसी कार होती!''
फिर उस कार वाले ने कहा, "तुम्हें यह ख्याहिश करनी चाहिए कि काश मेरे पास भी ऐसा भाई होता ।
"पड़ोसी की पत्नी उन दोनों की बातचीत सुन रही थी , बीच में ही उसने कहा कि “ काश , मैं ऐसा भाई होती ! '' कितने कमाल की बात है!
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